हनुमानजी के 15 रहस्य: जानिए बजरंगबली के अज्ञात तथ्य
हनुमानजी का नाम हर भक्त के हृदय में एक अलग ध्वनि के रूप में गूंजता है, और उनकी कथाओं और गुणों का अद्भुत महान संग्रह है जो हर युग में लोगों को प्रेरित करता है। यहां हम पेश कर रहे हैं ‘हनुमानजी के 15 रहस्य जानकर आप रह जाएंगे हैरान’, जो उनके विचारशील और गूढ़ अभिव्यक्तियों को उजागर करते हैं।
इस यात्रा में हम हनुमानजी के रहस्यमय जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूने का प्रयास करेंगे, जिनसे हम सभी को उनके अद्भुत महिमा और आदर्शों की ओर आग्रहित करने का अवसर मिलेगा। तो चलिए, हमारे साथ इस रहस्यमय सफर में निकलें और हनुमानजी की अद्वितीय और रोचक दुनिया को खोजें।

हनुमानजी
Shri Hanuman Chalisa in Hindi
हनुमान चालीसा भगवान हनुमान के अद्भुत कार्यों और वीरता के कृत्यों का एक समृद्ध भंडार है। यह समृद्ध संस्करण आपके लिए वही पवित्र ग्रंथ लाता है, जो केवल कई गुना अधिक immersive है क्योंकि दोहा के प्रत्येक शब्द जीवंत हो जाते हैं, जैसा कि वाल्मिकी रामायण, तुलसीदास के रामचरितमानस और भारत के लोककथाओं से ली गई कहानियों के माध्यम से समझाया गया है।
हनुमान जी का जन्म किस पर्वत पर हुआ था?

हनुमान जी का जन्म अंजनाद्री पर्वत पर हुआ था। यह पर्वत दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में स्थित है। अंजनाद्री पर्वत का नाम उनकी माता अंजना के नाम पर रखा गया है। अंजना देवी, जो एक अप्सरा थीं, ने भगवान शिव की भक्ति में ध्यान लगाया और एक पुत्र की प्राप्ति की कामना की। भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया और उनके पुत्र के रूप में स्वयं प्रकट हुए। इसी प्रकार, अंजना देवी ने हनुमान जी को जन्म दिया, जो भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार माने जाते हैं।
हनुमान जी का जन्म वानर राज केसरी और अंजना देवी के संतान के रूप में हुआ। जन्म के समय ही हनुमान जी में अद्वितीय शक्तियाँ थीं, जिनसे वे अपने समय के सबसे बलवान और ज्ञानवान व्यक्तियों में गिने जाते थे। उनकी शक्ति, भक्ति और सेवा के गुणों के कारण हनुमान जी को हिन्दू धर्म में एक विशेष स्थान प्राप्त है। वे रामायण के मुख्य पात्रों में से एक हैं और भगवान राम के परम भक्त माने जाते हैं। उनके जन्म दिवस को हनुमान जयंती के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
हनुमान जी की माता और पिता का नाम क्या है?
हनुमान जी के माता-पिता का नाम अंजना और केसरी है। हनुमान जी की माता अंजना देवी एक अप्सरा थीं, जो श्रापवश वानर रूप में धरती पर जन्मी थीं। उन्होंने भगवान शिव की भक्ति और तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र रत्न का वरदान दिया।
हनुमान जी के पिता केसरी वानर राज थे। केसरी अपने पराक्रम और वीरता के लिए विख्यात थे। वे बहुत ही धर्मपरायण और निष्ठावान राजा थे। अंजना और केसरी का विवाह हुआ और उनके पुत्र के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ।
हनुमान जी को शिवजी का अवतार माना जाता है और उनके जन्म का पौराणिक महत्व भी है। कहा जाता है कि वायुदेवता ने भी हनुमान जी के जन्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए उन्हें “पवनपुत्र” के नाम से भी जाना जाता है।
हनुमान जी अपनी माता-पिता की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा के लिए भी प्रसिद्ध हैं। वे भगवान राम के परम भक्त हैं और उनके जीवन की हर घटना में उनके माता-पिता के संस्कार और शिक्षा की झलक मिलती है। हनुमान जी के चरित्र और गुणों का वर्णन रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में विस्तृत रूप से मिलता है।
हनुमान जी का वास्तविक नाम क्या था?
हनुमान जी का वास्तविक नाम ‘अंजनेय‘ था, जो उनकी माता अंजना के नाम पर रखा गया था। उन्हें अनेक नामों से जाना जाता है, जिनमें ‘हनुमंत’, ‘मारुति’, ‘पवनपुत्र’, ‘बजरंगबली’, ‘महावीर’, ‘कपीश’, और ‘रामदूत’ प्रमुख हैं। ‘हनुमान’ नाम के पीछे एक कथा है। कहा जाता है कि बाल्यावस्था में हनुमान जी ने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया था। इस पर इंद्रदेव ने अपने वज्र से उन पर प्रहार किया, जिससे उनका जबड़ा (हिंदी में ‘हुनु’ या ‘हनु’) टूट गया। इसी घटना के कारण उनका नाम ‘हनुमान’ पड़ा।
हनुमान जी को शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार के रूप में माना जाता है। उनके पिता वानर राज केसरी और माता अंजना थीं। अंजना देवी ने भगवान शिव की तपस्या की थी और वरदान स्वरूप उन्हें हनुमान जी प्राप्त हुए थे।
हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और सेवा के गुणों के कारण वे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान रखते हैं। वे भगवान राम के परम भक्त माने जाते हैं और उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य भगवान राम की सेवा करना और उनके कार्यों में सहायता करना था। हनुमान जी का चरित्र, उनके गुण और उनकी भक्ति का वर्णन रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।
हनुमान जी के गुरु कौन थे?
हनुमान जी के गुरु सूर्यदेव थे। बाल्यावस्था में ही हनुमान जी ने शिक्षा प्राप्त करने की तीव्र इच्छा प्रकट की। अपनी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए वे सूर्यदेव के पास पहुँचे और उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अनुरोध किया। सूर्यदेव ने उनकी भक्ति और जिज्ञासा को देखकर उन्हें अपना शिष्य बनाया।

हनुमान जी ने सूर्यदेव से वेद, शास्त्र, कला, विज्ञान और विभिन्न अन्य विषयों का गहन अध्ययन किया। सूर्यदेव ने उन्हें सभी प्रकार की विद्या और ज्ञान प्रदान किया। हनुमान जी ने अपनी शिक्षा को अत्यंत निष्ठा और समर्पण के साथ ग्रहण किया और अपने गुरु के प्रति अत्यंत श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया।
हनुमान जी ने सूर्यदेव के चलते-फिरते रथ के साथ-साथ चलकर अपनी शिक्षा प्राप्त की, जिससे यह सिद्ध होता है कि उनकी सीखने की क्षमता और समर्पण असाधारण था। सूर्यदेव ने हनुमान जी की इस महान भक्ति और सीखने की लगन को देखकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि वे सभी ज्ञान में निपुण होंगे।
हनुमान जी के जीवन में सूर्यदेव के ज्ञान और शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। इस प्रकार, सूर्यदेव ने हनुमान जी को उनके अद्वितीय ज्ञान और शक्तियों से सुसज्जित किया, जिससे वे महावीर हनुमान बने और रामायण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हनुमान जी को पंचमुखी हनुमान क्यों कहा जाता है?
हनुमान जी को पंचमुखी हनुमान के रूप में इसलिए जाना जाता है क्योंकि उन्होंने एक विशेष समय पर पांच मुखों (सिरों) का धारण किया था। इस स्वरूप के पीछे एक महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है।

जब रावण के भाई अहिरावण ने भगवान राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया और उन्हें पाताल लोक में ले गया, तब हनुमान जी ने उनकी मुक्ति के लिए पाताल लोक में प्रवेश किया। अहिरावण को मारने के लिए, हनुमान जी को पांच विशेष दिशाओं में एक साथ पंचमुखी स्वरूप धारण करना पड़ा। इस पंचमुखी स्वरूप में उनके पांच मुख थे:
- पूर्व दिशा में हनुमान का मुख,
- दक्षिण दिशा में नरसिंह का मुख,
- पश्चिम दिशा में गरुड़ का मुख,
- उत्तर दिशा में वराह का मुख,
- ऊपर की दिशा में हयग्रीव का मुख।
इन पांच मुखों ने हनुमान जी को अद्वितीय शक्ति और सामर्थ्य प्रदान किया, जिससे वे अहिरावण का वध कर सके और भगवान राम और लक्ष्मण को मुक्त कर सके। इस प्रकार, हनुमान जी का पंचमुखी रूप उनके अतुलनीय पराक्रम और भक्ति का प्रतीक है।
पंचमुखी हनुमान जी की पूजा से भक्तों को विशेष आशीर्वाद और संरक्षण की प्राप्ति होती है। उनकी यह विशेष रूप धारण करने की कथा हनुमान जी के महान पराक्रम और उनके अनन्य भक्तिभाव को दर्शाती है।
हनुमान जी ने सीता माता का पता कैसे लगाया?

हनुमान जी ने माता सीता का पता लगाने का कार्य अत्यंत वीरता और चतुराई से किया। जब राम और लक्ष्मण ने सीता माता की खोज शुरू की, तब हनुमान जी ने सुग्रीव के निर्देश पर उनके साथ मिलकर लंका की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने समुद्र पार करके लंका पहुंचने का संकल्प लिया।
हनुमान जी ने विशालकाय रूप धारण करके समुद्र को लांघा और लंका पहुंचे। लंका में प्रवेश करने के लिए उन्होंने अपने आकार को छोटा कर लिया और राक्षसियों के ध्यान से बचते हुए लंका नगरी में प्रवेश किया। लंका में उन्होंने विभीषण से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें सीता माता के अशोक वाटिका में होने की जानकारी दी।
अशोक वाटिका में पहुंचकर, हनुमान जी ने देखा कि सीता माता रावण के अत्याचारों से दुखी होकर एक वृक्ष के नीचे बैठी हैं। हनुमान जी ने उन्हें राम का संदेश दिया और उनकी अंगूठी भेंट की, जो राम ने उन्हें पहचान के लिए दी थी। सीता माता ने हनुमान जी को अपना चूड़ामणि दिया ताकि वे उसे राम को सौंप सकें और उनकी स्थिति की जानकारी दे सकें।
इस प्रकार, हनुमान जी ने अपनी अद्वितीय शक्ति, साहस और भक्ति के माध्यम से सीता माता का पता लगाया और राम को उनके बारे में सूचित किया। उनकी इस महान कार्य ने रामायण में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया और रावण के अंत की दिशा में पहला कदम साबित हुआ।
हनुमान जी ने लंका दहन कैसे किया?
हनुमान जी ने लंका दहन अपने अद्वितीय साहस और पराक्रम से किया। जब हनुमान जी सीता माता से अशोक वाटिका में मिले और उन्हें राम का संदेश दिया, तब रावण के सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया और रावण के दरबार में ले गए। रावण ने हनुमान जी से उनके आने का कारण पूछा और जब हनुमान जी ने राम का संदेश सुनाया, तो रावण क्रोधित हो गया।

रावण ने हनुमान जी को मारने का आदेश दिया, लेकिन विभीषण ने उसे ऐसा न करने की सलाह दी। इसके बजाय, रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में कपड़े लपेटे और उसमें आग लगा दी। लेकिन हनुमान जी ने अपनी शक्ति से अपनी पूंछ को विशाल बना लिया और आग को सहन करते हुए लंका में कूद गए।
हनुमान जी ने जलती हुई पूंछ का उपयोग करके लंका के विभिन्न महलों, बागों और घरों को जलाना शुरू किया। उन्होंने रावण के महल को भी आग के हवाले कर दिया। लंका में चारों ओर आग फैल गई और भारी विनाश हुआ। इस बीच, हनुमान जी ने सुनिश्चित किया कि सीता माता सुरक्षित रहें।
लंका दहन के बाद, हनुमान जी ने समुद्र पार कर वापस राम के पास पहुंचकर सीता माता की स्थिति और लंका के दहन की जानकारी दी। हनुमान जी के इस कार्य ने रावण के आतंक को चुनौती दी और राम के विजय अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हनुमान जी को बजरंगबली क्यों कहा जाता है?
हनुमान जी को “बजरंगबली” के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि उनका शरीर वज्र (बिजली) की तरह कठोर और अजेय माना जाता है। “बजरंग” शब्द का अर्थ है वज्र (बिजली) के समान अंग वाला, और “बली” का अर्थ है शक्तिशाली।

हनुमान जी को यह नाम उनके अद्वितीय बल, शक्ति और साहस के कारण प्राप्त हुआ है। उनकी शक्ति और वीरता की अनेक कहानियाँ रामायण और अन्य पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित हैं। उनके वज्र के समान मजबूत शरीर के कारण वे अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं और किसी भी प्रकार के संकट का सामना करने में सक्षम हैं।
जब हनुमान जी ने समुद्र पार करके लंका में प्रवेश किया और वहाँ माता सीता का पता लगाया, तब उनकी शक्ति और साहस का प्रदर्शन हुआ। लंका दहन के समय भी उन्होंने अपनी अद्वितीय शक्ति का परिचय दिया। इसके अलावा, संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा करना, राम और सुग्रीव के मध्य मित्रता स्थापित करना, और रामसेतु निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना उनके अद्वितीय बल और साहस के उदाहरण हैं।
हनुमान जी का नाम “बजरंगबली” उनके अपार बल, अटूट विश्वास और अद्वितीय पराक्रम का प्रतीक है, जो उन्हें संपूर्ण हिन्दू धर्म में विशेष स्थान दिलाता है। उनकी भक्ति और शक्ति का गुणगान आज भी भक्तों द्वारा किया जाता है।
हनुमान जी ने किसके लिए संजीवनी बूटी लेकर आए थे?

हनुमान जी संजीवनी बूटी लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा के लिए लेकर आए थे। रामायण के युद्धकांड के दौरान, रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर शक्ति नामक शक्तिशाली अस्त्र से प्रहार किया, जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए और उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई।
लक्ष्मण जी की स्थिति देखकर भगवान राम बहुत व्याकुल हो गए। तब वैद्य सुषेण ने बताया कि लक्ष्मण जी को बचाने के लिए संजीवनी बूटी की आवश्यकता है, जो हिमालय पर्वत पर पाई जाती है। सुषेण ने कहा कि यदि संजीवनी बूटी समय पर लाई जाए, तो लक्ष्मण जी के प्राण बच सकते हैं।
हनुमान जी तुरंत हिमालय पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए। जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने कई प्रकार की औषधियों को देखा, लेकिन संजीवनी बूटी की पहचान करने में कठिनाई हुई। समय की गंभीरता को देखते हुए, हनुमान जी ने संपूर्ण पर्वत का एक हिस्सा ही उठा लिया और उसे लेकर वापस युद्धभूमि में आ गए।
सुषेण ने संजीवनी बूटी का उपयोग करके लक्ष्मण जी का उपचार किया, जिससे वे पुनः स्वस्थ हो गए। हनुमान जी की इस महान सेवा और साहस ने न केवल लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, बल्कि भगवान राम के प्रति उनकी भक्ति और निष्ठा को भी प्रदर्शित किया। यह घटना हनुमान जी के अद्वितीय पराक्रम और सेवा भाव का प्रमाण है।
हनुमान जी का वर्णन किस महाकाव्य में प्रमुखता से मिलता है?
हनुमान जी का विस्तृत वर्णन वाला महाकाव्य वाल्मीकि रामायण में प्रमुखता से मिलता है। वाल्मीकि रामायण एक प्राचीन संस्कृत काव्य है जो महाकाव्य की मानक परंपरा का हिस्सा है। इसमें हनुमान जी का वर्णन उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के रूप में किया गया है।
हनुमान जी वाल्मीकि रामायण में प्रभावशाली और महान चरित्र के रूप में प्रस्तुत हैं। उन्हें भगवान राम के विश्वासी भक्त, महावीर, और आदर्श हनुमान के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी वीरता, बुद्धिमत्ता, और निःस्वार्थ भक्ति ने उन्हें एक प्रतिष्ठित और प्रेरणादायक चरित्र के रूप में स्थान दिलाया है।
हनुमान जी ने राम की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित किया और उनके संदेशों को समय पर पहुंचाने के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना किया। उनकी कहानियाँ और उनकी वीरता को रामायण में अद्वितीय रूप से प्रस्तुत किया गया है, जो हमें धर्म, निष्ठा, और सेवा की महत्वपूर्ण शिक्षाएं देते हैं।
हनुमान जी का सबसे प्रिय भोजन क्या है?
हनुमान जी का सबसे प्रिय भोजन सुन्दरी का हनुमान द्वारिका नामक फल है। सुन्दरी फल को वनजीवनी फल भी कहा जाता है और यह फल हनुमान जी की प्रियता का प्रतीक माना जाता है।
वानरराज हनुमान की कई प्राचीन कथाएं सुन्दरी फल को उनके नाम से जोड़ती हैं। एक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी लंका की ओर जा रहे थे, तो उन्हें अकेले में भूख लगी और उन्होंने इस फल को खाया। इसके प्रभाव से हनुमान जी की शक्ति और वीरता और भी बढ़ गई। इसके बाद से हनुमान जी को सुन्दरी फल की अत्यंत प्रियता रही।
सुन्दरी फल को ब्रह्मांड की अद्वितीय और अमूर्त प्राणियों में से एक माना जाता है और इसका अत्यधिक महत्व हनुमान जी के जीवन में भी दिखाई गया है। इसके अतिरिक्त, हनुमान जी को अन्य प्रकार के फल और वनस्पतियों का भी पसंद है, लेकिन सुन्दरी फल उनका प्रिय भोजन है जिसे वे बहुत ही श्रद्धा और भक्ति से खाते हैं।
हनुमान जी का आशीर्वाद किसे मिला था कि वे हमेशा अजर-अमर रहेंगे?
हनुमान जी का अजर-अमर होने का वरदान उन्हें श्री राम के सेवक होने के कारण मिला था। रामायण में, जब हनुमान जी लंका में गए थे तब उन्होंने अपनी असीम शक्तियों का प्रदर्शन किया और लंका के राक्षसों से लड़ा। इस युद्ध में उन्होंने अपनी अद्वितीय शक्ति और वीरता का प्रदर्शन किया और सीता माता को खोजने में मदद की।
रामायण में वर्णित है कि हनुमान जी के शरीर का अपनी इच्छानुसार कोई भी वस्त्र नहीं चेष्टा सकता था, और उन्हें जिस भी चीज़ से छूने का प्रयास किया जाता, वह तत्काल अग्नि में समाहित हो जाता था। इस उपलब्धि के बाद, हनुमान जी को श्री राम ने अजर-अमर होने का आशीर्वाद दिया।
इस प्रकार, हनुमान जी का आशीर्वाद मिला कि वे हमेशा अजर-अमर रहेंगे और उनकी भक्ति और सेवा का प्रतिफल उन्हें अनन्त जीवन और शक्ति के साथ मिलेगा।
हनुमान जी ने रामायण के किस प्रमुख चरित्र को अपने कंधों पर बैठाया था?
हनुमान जी ने रामायण के प्रमुख चरित्र भगवान राम, सीता माता, लक्ष्मण, और हनुमान जी के गुरु सुग्रीव को भी अपने कंधों पर बैठाया था।

युद्ध के समय, रावण के अत्याचारों से पराजित होने के बाद, हनुमान जी ने लंका के दहन के बाद श्री राम, सीता माता, और लक्ष्मण को उधर से ले जाने का कार्य उत्तम तरीके से संपन्न किया। इस प्रकार, वे अपने कंधों पर राम, सीता, और लक्ष्मण को बैठाकर उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में सफल रहे।
इस प्रकार, हनुमान जी ने अपनी अनन्त शक्ति और वीरता का प्रदर्शन करते हुए रामायण के महत्वपूर्ण क्षणों में भगवान राम और उनके साथी को उधारी और सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। यह उनका निःस्वार्थ सेवा भाव और प्रेम का प्रतीक है, जो हनुमान जी को हमेशा महान और उदात्त चरित्र के रूप में याद किया जाता है।
हनुमान जी ने किस देवी-देवता से शक्तियाँ प्राप्त की थीं?
हनुमान जी ने अपनी अद्वितीय शक्तियों को माँ पवनपुत्री अन्जना देवी और पवन देव, वायु देवता से प्राप्त किया था।

माँ अन्जना की तपस्या और पूजा से पवनपुत्री अन्जना को वायुपुत्र हनुमान की कृपा प्राप्त हुई थी। उन्होंने अपनी तपस्या के बल पर भगवान पवन देव को प्रसन्न किया और उनकी कृपा से हनुमान जी का जन्म हुआ था। इस प्रकार, माँ अन्जना की कृपा से हनुमान जी को अद्वितीय शक्तियाँ प्राप्त हुईं थीं।
वायुपुत्र हनुमान के रूप में, हनुमान जी को वायु देवता का अवतार माना जाता है। वायु देवता की कृपा से हनुमान जी को अत्यंत बलशाली, शक्तिशाली, और वीर होने की विशेष प्राप्ति हुई थी। इसी कारण से, हनुमान जी को “वायुपुत्र” और “पवनसुत” के नामों से भी जाना जाता है।
इस रूप में, हनुमान जी की शक्तियों का स्रोत माँ अन्जना और पवन देव हैं, जिनकी कृपा से उन्हें अद्वितीय और अदम्य शक्तियाँ प्राप्त हुई थीं।
हनुमान जी के किस मंदिर को विश्व में सबसे प्रमुख माना जाता है?
हनुमान जी के कई मंदिर विश्व भर में हैं, लेकिन सबसे प्रमुख माना जाने वाला हनुमान जी का मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है, जिसका नाम “श्री हनुमान धाम” है।
श्री हनुमान धाम, प्रयागराज नगर के प्राचीन मंदिरों में से एक है और यहाँ हनुमान जी को अत्यंत भक्ति और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। यह मंदिर भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और विभिन्न धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का केंद्र है।
श्री हनुमान धाम में बड़ी भक्ति और उमंग के साथ हनुमान जी की पूजा और अर्चना की जाती है। यहाँ पर हर महीने हनुमान जी की जन्म जयंती और अन्य धार्मिक उत्सव मनाए जाते हैं, जो लाखों भक्तों को आकर्षित करते हैं।
श्री हनुमान धाम को सबसे प्रमुख माना जाता है क्योंकि यहाँ पर हनुमान जी को विशेष रूप से पूजा जाता है और इसका इतिहास और महत्व अत्यंत उत्कृष्ट है।